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श्लोक  12.346.1 
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं नरनारायणेरितम्।
अत्यन्तं भक्तिमान् देवे एकान्तित्वमुपेयिवान्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! नर-नारायण के वचन सुनकर नारदजी की भगवान् के प्रति भक्ति बहुत बढ़ गई। वे उनके अनन्य भक्त हो गए॥1॥
 
Vaishmpayana says- Janamejaya! On hearing the words of Nara-Narayana, Naradji's devotion towards the Lord increased a lot. He became his exclusive devotee. ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)