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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.345.5 
ततस्तद्भावितो नित्यं यजे वैकुण्ठमव्ययम्।
तस्माच्च प्रसृत: पूर्वं ब्रह्मा लोकपितामह:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अतः आपके उपदेश से प्रभावित होकर मैं प्रतिदिन अविनाशी भगवान वैकुण्ठ की स्तुति करता हूँ। जगतपिता ब्रह्माजी सर्वप्रथम उन्हीं से प्रकट हुए हैं।
 
Therefore, influenced by your advice, I offer prayers to the immortal Lord Vaikuntha every day. It is from him that the world father Brahmaji has first appeared.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)