श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.345.4 
नारद उवाच
त्वयैतत् कथितं पूर्वे दैवं कर्तव्यमित्यपि।
दैवतं च परो यज्ञ: परमात्मा सनातन:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले - प्रभु ! आपने ही पहले कहा था कि देवकर्म सबका कर्तव्य है; क्योंकि देवकर्म ही सर्वश्रेष्ठ यज्ञ है और यज्ञ सनातन भगवान् का स्वरूप है॥4॥
 
Naradji said - Prabhu! You yourself had said earlier that Devkarma is the duty of everyone; because Devkarma is the best sacrifice and sacrifice is the form of the eternal God.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)