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mahabharat 12.345.26-27: जो मनुष्य मन, वाणी और कर्म से देवताओं, पितरों, गुरुओं, अतिथियों, गौओं, श्रेष्ठ ब्राह्मणों, पृथ्वी और माता का पूजन करते हैं, वे वास्तव में भगवान विष्णु का ही पूजन करते हैं; क्योंकि भगवान विष्णु समस्त प्राणियों के शरीर के अन्तर्यामी रूप में निवास करते हैं॥26-27॥   |   mahabharat अध्याय 12.345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  12.345.26-27 
ये यजन्ति पितॄन् देवान् गुरूंश्चैवातिथींस्तथा।
गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं यथा॥ २६॥
कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते।
अन्तर्गत: स भगवान् सर्वसत्त्वशरीरग:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य मन, वाणी और कर्म से देवताओं, पितरों, गुरुओं, अतिथियों, गौओं, श्रेष्ठ ब्राह्मणों, पृथ्वी और माता का पूजन करते हैं, वे वास्तव में भगवान विष्णु का ही पूजन करते हैं; क्योंकि भगवान विष्णु समस्त प्राणियों के शरीर के अन्तर्यामी रूप में निवास करते हैं॥26-27॥
 
Those who worship the gods, ancestors, gurus, guests, cows, best Brahmins, earth and mother through mind, speech and action, they actually worship Lord Vishnu only; Because Lord Vishnu resides in the inner form of the body of all living beings. 26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)