vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 344: नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना
»
श्लोक 4
श्लोक
12.344.4
तपो हि तप्यतस्तस्य यत् स्थानं परमात्मन:।
न तत् सम्प्राप्नुते कश्चिदृते ह्यावां द्विजोत्तम॥ ४॥
अनुवाद
द्विजोत्तम! हम दोनों के अतिरिक्त तपस्या में तत्पर रहने वाला भगवान् के धाम को कोई दूसरा नहीं पहुँच सकता॥4॥
Dwijottam! Apart from both of us, no one else can reach the place of God who is engaged in penance. 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×