Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.344.17-18: तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ द्विज तीनों गुणों से मुक्त होकर अनायास ही उस ईश्वररहित परम पुरुष में प्रवेश करते हैं। उन सबके धाम भगवान वासुदेव को ही तुम क्षेत्रज्ञ समझो। 17-18॥   |   mahabharat अध्याय 12.344: नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 344: नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  12.344.17-18 
ततस्त्रैगुण्यहीनास्ते परमात्मानमञ्जसा॥ १७॥
प्रविशन्ति द्विजश्रेष्ठा: क्षेत्रज्ञं निर्गुणात्मकम्।
सर्वावासं वासुदेवं क्षेत्रज्ञं विद्धि तत्त्वत:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ द्विज तीनों गुणों से मुक्त होकर अनायास ही उस ईश्वररहित परम पुरुष में प्रवेश करते हैं। उन सबके धाम भगवान वासुदेव को ही तुम क्षेत्रज्ञ समझो। 17-18॥
 
Thereafter, those superior Dwijas, freed from all three gunas, spontaneously enter into the Godless Supreme Being. Consider Lord Vasudev, the abode of all, as the expert of the field. 17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)