श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 343: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  12.343.64 
या: क्रिया: सम्प्रयुक्ताश्च एकान्तगतबुद्धिभि:।
ता: सर्वा: शिरसा देव: प्रतिगृह्णाति वै स्वयम्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
भगवान् स्वयं उन भक्तों द्वारा किए गए समस्त कार्यों को स्वीकार करते हैं जिनकी बुद्धि अनन्य रूप से भगवान् में ही केन्द्रित है ॥ 64॥
 
The Lord Himself accepts all the activities performed by devotees whose intellect is exclusively focused on Him. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)