श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 343: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.343.57 
तपसा योज्य सोऽऽत्मानं श्वेतद्वीपात् परं हि यत् ।
तेज इत्यभिविख्यातं स्वयंभासाऽवभासितम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
वे तपस्या में तत्पर होकर श्वेत द्वीप के पार भी चमकने वाले अपने तेजस्वी रूप के लिए विख्यात हैं। उनकी प्रभा उनके ही तेज से प्रकाशित होती है ॥57॥
 
By devoting himself to austerities, he is famous for his radiant form which shines even beyond the white island. His radiance is illuminated by his own light. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)