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mahabharat 12.343.54: वे सदैव भगवान नारायण का भजन करते हैं और भगवान भी सदैव प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ क्रीड़ा करते हैं। भगवान अपने भक्तों से अत्यंत प्रेम करते हैं और परम भगवान श्री हरि भी ब्राह्मणों के प्रेमी हैं॥54॥   |   mahabharat अध्याय 12.343: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 343: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.343.54 
तेऽर्चयन्ति सदा देवं तै: सार्धं रमते च स:।
प्रियभक्तो हि भगवान् परमात्मा द्विजप्रिय:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वे सदैव भगवान नारायण का भजन करते हैं और भगवान भी सदैव प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ क्रीड़ा करते हैं। भगवान अपने भक्तों से अत्यंत प्रेम करते हैं और परम भगवान श्री हरि भी ब्राह्मणों के प्रेमी हैं॥54॥
 
They always worship Lord Narayana and the Lord also always happily plays with them. The Lord loves his devotees very much and the Supreme Lord Shri Hari is also a lover of Brahmins. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)