श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 343: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.343.5 
दृष्टवान् नारदो यत्तु देवं नारायणं हरिम्।
नूनमेतद्धॺनुमतं तस्य देवस्य सूतज॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सुतानन्दन! नारदजी द्वारा परब्रह्म नारायण हरि का दर्शन निःसंदेह परब्रह्म की अनुमति से ही संभव हुआ था॥5॥
 
Sutanandan! The darshan of the Supreme God Narayana Hari by Narada was certainly possible only with the permission of the Supreme Lord. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)