श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 343: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  12.343.30-31 
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं दॄष्ट्वा च हरिमव्ययम्॥ ३०॥
निवृत्तो नारदो राजंस्तरसा मेरुमागमत्।
हृदयेनोद्वहन् भारं यदुक्तं परमात्मना॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
राजन ! जब नारदजी श्वेत नामक महाद्वीप का भ्रमण करके और वहाँ अविनाशी श्रीहरि का दर्शन करके लौटे, तब वे बड़े वेग से मेरु पर्वत पर पहुँचे। वे परम प्रभु श्रीहरि ने जो कुछ उनसे कहा था, उसका उत्तरदायित्व पूरे मन से वहन कर रहे थे ॥30-31॥
 
King! When Naradji returned after visiting the continent named Shwet and seeing the indestructible Shri Hari there, he reached Mount Meru with great speed. He was carrying the responsibility of whatever the Supreme Lord Shri Hari had told him with all his heart. ॥ 30-31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)