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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 343: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.343.20 
न चास्य किंचिदप्राप्यं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु।
त्रैलोक्यनाथो विष्णु: स यथाऽऽसीत् साह्यकृत् स वै॥ २०॥
 
 
अनुवाद
मैं यह नहीं मानता कि जब त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण उनके सहायक थे, तो उनके लिए तीनों लोकों में कुछ भी प्राप्त करना असंभव रहा होगा।
 
I do not believe that when Trilokinath Lord Krishna was his helper, it would have been impossible for him to obtain anything in the three worlds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)