अध्याय 343: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना
श्लोक 1: शौनक बोले- हे सूतानंदपुत्र! तुमने बहुत ही उत्तम कथा कही है। उसे सुनकर सभी ऋषिगण बहुत आश्चर्यचकित हुए॥1॥
श्लोक 2: हे सूतकुमार! समस्त ऋषियों के आश्रमों में जाना और समस्त तीर्थों में स्नान करना भी भगवान नारायण की कथा के समान फलदायी नहीं है॥ 2॥
श्लोक 3: सब पापों से मुक्त करने वाली नारायण सम्बन्धिनी की इस पुण्यमयी कथा को आरम्भ से सुनने से हमारा तन-मन पवित्र हो गया। 3॥
श्लोक 4: सर्वत्र विख्यात भगवान नारायणदेव का दर्शन ब्रह्मा आदि सभी देवताओं तथा अन्य महर्षियों के लिए भी दुर्लभ है। 4॥
श्लोक 5: सुतानन्दन! नारदजी द्वारा परब्रह्म नारायण हरि का दर्शन निःसंदेह परब्रह्म की अनुमति से ही संभव हुआ था॥5॥
श्लोक 6-7h: क्या कारण है कि नारद जी ने अनिरुद्ध रूपधारी भगवान जगन्नाथ और भगवान हरि को देखा और फिर वहाँ से दौड़कर देवताओं में श्रेष्ठ नर-नारायण के दर्शन के लिए चले गए? कृपया मुझे यह बताइए।
श्लोक 7-9h: सूतपुत्र बोले - शौनक! राजा जनमेजय का यज्ञ नित्य की भाँति चल रहा था। उसमें जब राजेन्द्र जनमेजय को विभिन्न कार्यों के बीच अवकाश मिला, तब उन्होंने अपने पूर्वजों के पितामह, महान वेदनिधि भगवान कृष्णद्वैपायन महर्षि व्यास से इस प्रकार पूछा। 7-8 1/2"
श्लोक 9-10h: जनमेजय बोले - हे प्रभु! भगवान नारायण के वचनों पर विचार करके जब नारद मुनि श्वेतद्वीप से लौटे, तब उन्होंने क्या किया?॥9 1/2॥
श्लोक 10-11h: बदरिकाश्रम में आकर उन दोनों ऋषियों से मिलकर नारदजी वहाँ कितने समय तक रुके और उनसे क्या वृत्तांत पूछा?॥10 1/2॥
श्लोक 11-12h: एक लाख श्लोकों वाले विस्तृत महाभारत इतिहास से आपने जो कथा का सार सुनाया है, वह बुद्धिरूपी मथानी से मंथन करके ज्ञानसागर से निकाले गए अमृत के समान है। ॥11/2॥
श्लोक 12-13: हे ब्रह्मन्! जैसे दही से मक्खन, मलय पर्वत से चंदन, वेदों से आरण्यक और औषधियों से अमृत निकाला गया है, उसी प्रकार आपने इस कथारूपी अमृत को निकालकर सुरक्षित रखा है॥12-13॥
श्लोक 14: तपोनिधि! भगवान नारायण की कथा के सम्बन्ध में आपने जो कुछ कहा है, वही इस ग्रन्थ का सार है। सबके ईश्वर भगवान नारायण ही समस्त प्राणियों के रचयिता हैं।॥14॥
श्लोक 15-16: द्विजश्रेष्ठ! उन भगवान नारायण की महिमा अद्भुत है। मनुष्यों के लिए उनकी ओर देखना भी कठिन है। कल्प के अंत में जिनके भीतर ब्रह्मा आदि सभी देवता, ऋषि, गन्धर्व और चराचर जगत में विद्यमान सभी प्राणी विलीन हो जाते हैं, मैं उनसे बढ़कर इस पृथ्वी और स्वर्ग में किसी अन्य को पवित्र और महान नहीं मानता। 15-16॥
श्लोक 17: समस्त ऋषियों के आश्रमों में जाने और समस्त तीर्थों में स्नान करने से भगवान नारायण की कथा के समान फल नहीं मिलता॥17॥
श्लोक 18: सम्पूर्ण जगत के स्वामी श्री हरि की कथा समस्त पापों का नाश करने वाली है। इसे प्रारम्भ से ही सुनकर हम सभी यहाँ पूर्णतः पवित्र हो गए हैं।॥18॥
श्लोक 19: मेरे दादा अर्जुन ने भगवान वासुदेव की सहायता से महान विजय प्राप्त की थी; किन्तु उन्होंने वहाँ कोई असाधारण कार्य नहीं किया था।
श्लोक 20: मैं यह नहीं मानता कि जब त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण उनके सहायक थे, तो उनके लिए तीनों लोकों में कुछ भी प्राप्त करना असंभव रहा होगा।
श्लोक 21: ब्रह्मन्! मेरे सभी पूर्वज धन्य थे, जिनके हित और कल्याण के लिए जनार्दन सदैव तत्पर रहते थे।
श्लोक 22: भगवान नारायण की पूजा लोग केवल तपस्या से ही कर सकते हैं; परंतु मेरे पिता को श्रीवत्स चिह्न से विभूषित उन भगवान का अनायास ही साक्षात् दर्शन प्राप्त हो गया था॥22॥
श्लोक 23-24: सबसे अधिक धन्यवाद के पात्र ब्रह्मापुत्र नारद हैं। मैं अमर नारद को कम प्रतिभाशाली ऋषि नहीं मानता, जिन्होंने श्वेतद्वीप पहुँचकर श्रीहरि के दर्शन प्राप्त किए। उनका ईश्वर-दर्शन स्पष्टतः उन्हीं ईश्वर की कृपा का परिणाम है।
श्लोक 25-26h: मुने ! उस समय नारद जी श्वेतद्वीप में जाकर अनिरुद्ध-विग्रह में स्थित नारायणदेव से मिले और पुनः नर-नारायण के दर्शन करने के लिए बदरिका आश्रम में गए। इसका क्या कारण है? 25 1/2॥
श्लोक 26-27: जब ब्रह्माजी के पुत्र नारद श्वेतद्वीप से लौटकर बदरिकाश्रम पहुँचे और उन दोनों ऋषियों से मिले, तो वे वहाँ कितने समय तक रहे और उनसे क्या प्रश्न पूछे?॥26-27॥
श्लोक 28-29h: श्वेतद्वीप से लौटने पर नर-नारायण मुनि ने नारदजी से क्या बातें कीं? कृपया मुझे ये सब बातें विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 29-30h: वैशम्पायन जी बोले: उन परम तेजस्वी भगवान व्यास जी को नमस्कार है, जिनकी कृपा से मैं भगवान नारायण की यह कथा कह रहा हूँ।
श्लोक 30-31: राजन ! जब नारदजी श्वेत नामक महाद्वीप का भ्रमण करके और वहाँ अविनाशी श्रीहरि का दर्शन करके लौटे, तब वे बड़े वेग से मेरु पर्वत पर पहुँचे। वे परम प्रभु श्रीहरि ने जो कुछ उनसे कहा था, उसका उत्तरदायित्व पूरे मन से वहन कर रहे थे ॥30-31॥
श्लोक 32: हे मनुष्यों के स्वामी! तत्पश्चात् उन्हें यह सोचकर आश्चर्य हुआ कि मैं इतनी लम्बी यात्रा करके कैसे सकुशल यहाँ वापस आ गया?॥ 32॥
श्लोक 33: तत्पश्चात् वे मेरे पास से गन्धमादन पर्वत की ओर चले और तुरंत ही बदरीविशाल तीर्थ के निकट आकाश से उतर आये ॥33॥
श्लोक 34: वहाँ उन्होंने दो प्राचीन देवताओं, महान ऋषियों नर और नारायण को देखा, जो आत्मकेंद्रित थे और एक महान व्रत लेकर कठोर तपस्या कर रहे थे।
श्लोक 35: वे दोनों सूर्य से भी अधिक तेजस्वी थे और सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित कर रहे थे। उन पूज्य मुनियों की छाती पर श्रीवत्स के चिह्न शोभायमान थे और वे मस्तक पर जटाएँ धारण किये हुए थे।
श्लोक 36-37: उनके हाथों में हंस और पैरों में चक्र का चिह्न था। विशाल वक्ष, विशाल भुजाएँ, प्रत्येक अंडकोष में चार बीज, मुख में साठ दाँत और आठ दाढ़ें, मेघ के समान गहरी आवाज़, सुन्दर मुख, चौड़ा माथा, घुमावदार भौहें, सुन्दर ठोड़ी और आकर्षक नाक के कारण वे अत्यंत सुन्दर दिखते थे।
श्लोक 38-39: उन दोनों देवताओं के सिर छत्र के समान प्रतीत हो रहे थे। उन दोनों महापुरुषों को ऐसे शुभ गुणों से युक्त देखकर नारद जी बहुत प्रसन्न हुए। भगवान नर और नारायण ने भी नारद जी का स्वागत किया और उनका कुशलक्षेम पूछा। 38-39।
श्लोक 40-41h: तत्पश्चात् नारदजी ने उन दोनों महापुरुषों को देखकर मन में सोचा - हे प्रभु! ये दोनों महर्षि भी तो उन्हीं पूजनीय सदस्यों के समान हैं, जिन्हें मैंने श्वेतद्वीप में भगवान की सभा में देखा था।
श्लोक 41-42h: ऐसा मन में विचार करके उसने उन दोनों की परिक्रमा की और फिर एक सुन्दर गद्दी पर बैठ गया।
श्लोक 42-43: तदनन्तर तप, यश और कीर्ति के धाम तप से धन्य दोनों ऋषिगण प्रातःकाल अपनी नित्यक्रिया पूर्ण करके फिर शान्त भाव से पाद्य और अर्घ्य आदि प्रार्थना करके भगवान नारदजी की पूजा करने लगे ॥42-43॥
श्लोक 44-45h: नरेश्वर! अपनी नित्यक्रिया पूरी करके और नारदजी का आतिथ्य करके वे दोनों ऋषि भी दुशासन पर बैठ गए। उन तीनों के वहाँ बैठते ही वह क्षेत्र घी की आहुति से प्रज्वलित विशाल ज्वालाओं वाले तीन अग्नियों से प्रकाशित यज्ञमंडप के समान शोभायमान होने लगा। 44 1/2॥
श्लोक 45-46h: तत्पश्चात् आतिथ्य स्वीकार करके, वहाँ सुखपूर्वक बैठकर विश्राम करने के पश्चात नारायण ने नारदजी से इस प्रकार कहा।
श्लोक 46-47h: नर-नारायण बोले- देवर्ष! क्या आपने इस समय श्वेतद्वीप में जाकर हम दोनों के परम कारण सनातन परमात्मा का दर्शन किया है? 46 1/2॥
श्लोक 47-48h: नारदजी बोले - प्रभु ! मैंने उस अविनाशी और तेजोमय परमेश्वर को देखा है जो जगत् रूप में स्थित है। ऋषियों सहित देवता और सम्पूर्ण जगत् उनमें निवास करते हैं ॥47 1/2॥
श्लोक 48-49: इस समय भी आप दोनों सनातन पुरुषों को देखकर मुझे यहाँ श्वेत द्वीप पर निवास करने वाले भगवान् का दर्शन हो रहा है। वहाँ मैंने अव्यक्त रूप में श्रीहरि के जो-जो लक्षण देखे थे, आप दोनों व्यक्त रूप में भी उन्हीं लक्षणों से सुशोभित हैं। ॥48-49॥
श्लोक 50: इतना ही नहीं, मैंने वहाँ भी तुम दोनों को परमेश्वर के साथ उपस्थित देखा था और उन्हीं परमेश्वर के कारण आज पुनः मुझे यहाँ भेजा है ॥50॥
श्लोक 51: हे धर्म के पुत्रों, आप दोनों के अतिरिक्त तीनों लोकों में तेज, यश और धन में भगवान् के समान और कौन है? ॥ 51॥
श्लोक 52: उन भगवान श्रीहरि ने मुझे सम्पूर्ण धर्म समझाया था। उन्होंने मुझे क्षेत्रज्ञ से भी परिचित कराया था और भविष्य में यहाँ जन्म लेने वाले अवतारों के विषय में भी बताया था ॥ 52॥
श्लोक 53: वहाँ चन्द्रमा के समान गौर वर्ण वाले वे पुरुष सभी पाँचों इन्द्रियों से रहित अर्थात् पाँच भौतिक शरीरों से रहित, ज्ञानी और परम पुरुष श्री विष्णु के भक्त थे ॥53॥
श्लोक 54: वे सदैव भगवान नारायण का भजन करते हैं और भगवान भी सदैव प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ क्रीड़ा करते हैं। भगवान अपने भक्तों से अत्यंत प्रेम करते हैं और परम भगवान श्री हरि भी ब्राह्मणों के प्रेमी हैं॥54॥
श्लोक 55: वे सर्वव्यापी भगवान हैं, जो जगत का पालन करते हैं और महान भक्त हैं। भगवान के भक्तों में सबसे प्रिय और प्रियतम श्रीहरि, जहाँ भक्तों द्वारा उनकी पूजा की जाती है, वहाँ सदैव प्रसन्न रहते हैं।
श्लोक 56: वे ही कर्ता, कारण और कार्य हैं। उनकी शक्ति और महिमा अनंत है। वे ही तेजोमय ईश्वर कारण, आदेश, नियम और सिद्धांत हैं ॥ 56॥
श्लोक 57: वे तपस्या में तत्पर होकर श्वेत द्वीप के पार भी चमकने वाले अपने तेजस्वी रूप के लिए विख्यात हैं। उनकी प्रभा उनके ही तेज से प्रकाशित होती है ॥57॥
श्लोक 58: उस परमात्मा ने तीनों लोकों में उस शांति को फैलाया है। अपनी इसी शुभ बुद्धि से वह नैष्ठिक व्रत का आश्रय लेकर स्थित है ॥58॥
श्लोक 59: वहाँ सूर्य नहीं चमकता, चन्द्रमा नहीं चमकता और कठोर तपस्या में लगे हुए भगवान् हरि के पास सांसारिक वायु भी नहीं बहती ॥59॥
श्लोक 60: भूमि पर एक ऊँची वेदी बनी है, जिसकी ऊँचाई आठ अंगुल के बराबर है। उस पर ब्रह्माण्ड के रचयिता परमेश्वर एक पैर पर, दोनों हाथ ऊपर उठाए, उत्तर दिशा की ओर मुख किए हुए खड़े हैं।
श्लोक 61-63: वे समस्त वेदों का उनके भागों सहित पाठ करते हुए अत्यन्त घोर तपस्या में लगे रहते हैं। ब्रह्मा, स्वयं महादेव, सम्पूर्ण ऋषिगण, शेष, महान देवता, दैत्य, दानव, सर्प, गरुड़, गन्धर्व, सिद्ध और राजर्षि जो भी विधिपूर्वक हवन और अर्पण करते हैं, वह सब उन्हीं भगवान के चरणों में प्रकट होता है ॥61-63॥
श्लोक 64: भगवान् स्वयं उन भक्तों द्वारा किए गए समस्त कार्यों को स्वीकार करते हैं जिनकी बुद्धि अनन्य रूप से भगवान् में ही केन्द्रित है ॥ 64॥
श्लोक 65: तीनों लोकों में भगवान् को वहाँ के बुद्धिमान् और महान् भक्तों से बढ़कर कोई प्रिय नहीं है; इसलिए मैंने अनन्य भक्ति से उनकी शरण ली है ॥ 65॥
श्लोक 66: मैं भी उन्हीं भगवान के भेजे होने के कारण यहाँ आया हूँ। स्वयं भगवान हरि ने मुझसे ऐसा कहा था। अब मैं उनकी भक्ति में लीन रहूँगा और सदैव तुम दोनों के साथ यहीं रहूँगा। 66।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥