श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक d2h-67
 
 
श्लोक  12.342.d2h-67 
(नाम्नां निरुक्तं वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानस:।)
बोधनात् तापनाच्चैव जगतो हर्षणं भवेत् ।
अग्नीषोमकृतैरेभि: कर्मभि: पाण्डुनन्दन।
हृषीकेशोऽहमीशानो वरदो लोकभावन:॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
अब मैं अपने नामों का वर्णन करूँगा। तुम एकाग्र होकर सुनो। चन्द्रमा और सूर्य सुखदायक हैं, क्योंकि वे जगत को ऊष्मा और ताप प्रदान करते हैं। पाण्डुनन्दन! अग्नि और सोम के इन कर्मों के कारण ही मैं 'हृषीकेश'* कहलाता हूँ, अर्थात् जगत् को प्रेम करने वाला, मंगल प्रदान करने वाला भगवान् हूँ। 67॥
 
Now I will explain my names. You listen with concentration. The moon and the sun are pleasant because they provide warmth and warmth to the world. Pandunandan! Through these deeds done by Agni and Soma, I am called 'Hrishikesh'*, the world-loving God who grants blessings. 67॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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