श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 99-100h
 
 
श्लोक  12.342.99-100h 
पञ्चकल्पमथर्वाणं कृत्याभि: परिबृंहितम्॥ ९९॥
कल्पयन्ति हि मां विप्रा अथर्वाणविदस्तथा।
 
 
अनुवाद
अथर्ववेदी ब्राह्मण मुझे 'अथर्ववेद' का पंच-कल्प रूप मानते हैं, जो अनुष्ठानों और जादुई प्रयोगों से परिपूर्ण है।
 
The Atharvavedi Brahmins consider me to be the five-kalpa form of 'Atharvaveda', complete with rituals and magical experiments.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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