श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 98-99h
 
 
श्लोक  12.342.98-99h 
गायन्त्यारण्यके विप्रा मद्भक्तास्ते हि दुर्लभा:।
षट्पञ्चाशतमष्टौ च सप्तत्रिंशतमित्युत॥ ९८॥
यस्मिन् शाखा यजुर्वेदे सोऽहमाध्वर्यवे स्मृत:।
 
 
अनुवाद
वनों में ब्राह्मण मेरा गुणगान करते हैं। वे दुर्लभ हैं, मेरे परम भक्त हैं। छप्पन+आठ+सैंतीस=एक सौ एक शाखाओं वाला यजुर्वेद भी मेरा गुणगान करता है॥98 1/2॥
 
In the forests, the Brahmins sing my praises. They are rare to find, my supreme devotees. The Yajurveda, which has fifty-six + eight + thirty-seven = one hundred and one branches, also sings my praises.॥98 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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