श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  12.342.91 
शुचीनि श्रवणीयानि शृणोमीह धनंजय।
न च पापानि गृह्णामि ततोऽहं वै शुचिश्रवा:॥ ९१॥
 
 
अनुवाद
हे धनंजय! मैं यहाँ केवल शुद्ध एवं योग्य वचनों को ही सुनता हूँ तथा पापयुक्त वचनों को कभी ग्रहण नहीं करता, इसलिए मेरा नाम 'शुचिश्रवा' है।
 
O Dhananjaya! I only listen to pure and worthy words here and never accept sinful words, therefore my name is 'Shuchishrava'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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