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mahabharat 12.342.89: कपि' शब्द का अर्थ है सूअर और श्रेष्ठ, तथा वृष का अर्थ है धर्म। मैं वराह रूप हूँ और श्रेष्ठ हूँ; इसलिए प्रजापति कश्यप मुझे 'वृषकपि' कहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  12.342.89 
कपिर्वराह: श्रेष्ठश्च धर्मश्च वृष उच्यते।
तस्माद् वृषाकपिं प्राह कश्यपो मां प्रजापति:॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
कपि' शब्द का अर्थ है सूअर और श्रेष्ठ, तथा वृष का अर्थ है धर्म। मैं वराह रूप हूँ और श्रेष्ठ हूँ; इसलिए प्रजापति कश्यप मुझे 'वृषकपि' कहते हैं।
 
The word 'Kapi' means boar and the best and Vrish means Dharma. I am in the form of Varaah and the best; hence Prajapati Kashyap calls me 'Vrishakapi'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)