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श्लोक 12.342.86-87  |
त्रयो हि धातव: ख्याता: कर्मजा इति ते स्मृता:।
पित्तं श्लेष्मा च वायुश्च एष संघात उच्यते॥ ८६॥
एतैश्च धार्यते जन्तुरेतै: क्षीणैश्च क्षीयते।
आयुर्वेदविदस्तस्मात् त्रिधातुं मां प्रचक्षते॥ ८७॥ |
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| अनुवाद |
| शरीर में तीन धातुएँ हैं - वात, पित्त और कफ। ये सभी कर्म से उत्पन्न मानी गई हैं। इनका समुदाय त्रिधातु कहलाता है। जीव इन्हीं धातुओं के कारण जीवित रहते हैं और इनके क्षीण होने पर दुर्बल हो जाते हैं। इसीलिए आयुर्वेद के विद्वान मुझे 'त्रिधातु' कहते हैं। 86-87॥ |
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| The three metals in the body are Vata, Pitta and Kapha. All of them are considered to be born out of karma. Their community is called Tridhatu. Living beings sustain life due to the presence of these metals and become weak when they get depleted. That is why scholars of Ayurveda call me 'Tridhatu'. 86-87॥ |
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