श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  12.342.85 
घृतं ममार्चिषो लोके जन्तूनां प्राणधारणम्।
घृतार्चिरहमव्यग्रैर्वेदज्ञै: परिकीर्तित:॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
प्राणियों के प्राणों का पोषण करने वाला घी ही मेरे स्वरूप अग्निदेव की अग्नि की ज्वाला को जगाने वाला है; इसीलिए शान्त वेद विद्वानों ने मुझे 'घृतार्ची' कहा है ॥85॥
 
The ghee that nourishes the lives of living beings is the one that awakens the flame of the fire of my form, Agnidev; That is why peaceful Veda scholars have called me 'Ghritarchi'. 85॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd