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mahabharat 12.342.84: महर्षि अधोक्षज शब्द को तीन अलग-अलग शब्दों का समूह मानते हैं - 'अ' का अर्थ है प्रलय का स्थान, 'धोक्ष' का अर्थ है पालन-पोषण का स्थान और 'ज' का अर्थ है उत्पत्ति का स्थान। नारायण ही उत्पत्ति, पालन और प्रलय का स्थान हैं; अतः भगवान नारायण के अतिरिक्त संसार में अन्य किसी को 'अधोक्षज' नहीं कहा जा सकता।   |   mahabharat अध्याय 12.342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  12.342.84 
शब्द एकपदैरेष व्याहृत: परमर्षिभि:।
नान्यो ह्यधोक्षजो लोके ऋते नारायणं प्रभुम्॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
महर्षि अधोक्षज शब्द को तीन अलग-अलग शब्दों का समूह मानते हैं - 'अ' का अर्थ है प्रलय का स्थान, 'धोक्ष' का अर्थ है पालन-पोषण का स्थान और 'ज' का अर्थ है उत्पत्ति का स्थान। नारायण ही उत्पत्ति, पालन और प्रलय का स्थान हैं; अतः भगवान नारायण के अतिरिक्त संसार में अन्य किसी को 'अधोक्षज' नहीं कहा जा सकता।
 
Maharshis consider the word Adhokshaj to be a group of three separate words – ‘a’ means place of dissolution, ‘dhoksh’ means place of upbringing and ‘ja’ means place of origin. Narayana is the only place of origin, sustenance and dissolution; hence, except Lord Narayana, no one else in the world can be called ‘Adhokshaj’.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)