श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  12.342.82 
पृथिवीनभसी चोभे विश्रुते विश्वतोमुखे।
तयो: संधारणार्थं हि मामधोक्षजमञ्जसा॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
('अध:' का अर्थ है पृथ्वी, 'अक्ष' का अर्थ है आकाश और 'ज' का अर्थ है उन्हें धारण करने वाला) पृथ्वी और आकाश दोनों ही सर्वव्यापी और प्रसिद्ध हैं। चूँकि मैं उन्हें सहज रूप से धारण करता हूँ, इसलिए लोग मुझे 'अधोक्षज' कहते हैं। 82.
 
('Adh:' means earth, 'Aksh' means sky and 'Ja' means the one who holds them) Both earth and sky are omnipresent and famous. Because I hold them effortlessly, people call me 'Adhokshaja'. 82.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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