श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  12.342.80 
मया संश्लेषिता भूमिरद्भिर्व्योम च वायुना।
वायुश्च तेजसा सार्धं वैकुण्ठत्वं ततो मम॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
मैंने ही भूमि को जल से, आकाश को वायु से और वायु को तेज से संयुक्त किया है। इसलिए (विगत कुन्था पंचानां भूतानां मेले असमर्थ्य यस्य स: विकुन्था:, विकुन्था एव वैकुण्ठ: - जिनकी शक्ति पाँचों भूतों को एक करने में कभी कुंठित नहीं होती, वे भगवान वैकुण्ठ हैं, इस व्युत्पत्ति के अनुसार) मुझे 'वैकुण्ठ' कहा जाता है। 80॥
 
I have combined the land with water, the sky with air and the air with light. Therefore (Vigata Kuntha Panchanaan Bhootanaan Mele Asamarthya Yasya Sa: Vikuntha:, Vikuntha Eva Vaikunta: - Whose power never gets frustrated in merging the five ghosts, He is Lord Vaikunta, according to this etymology) I am called 'Vaikuntha'. 80॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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