श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.342.8 
नासीदहो न रात्रिरासीन्न सदासीन्नासदासीत् तम एव पुरस्तादभवद् विश्वरूपम्। सा विश्वरूपस्य रजनी हि एवमस्यार्थोऽनुभाष्य:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
उस प्रलय काल में न दिन था, न रात्रि, न सत्य था, न असत्य, केवल अंधकार ही अंधकार था। वही सर्वव्यापी हो रहा था। वही विश्वात्मा की रात्रि है। इस श्रुतिका का अर्थ इसी प्रकार कहना और समझना चाहिए॥8॥
 
In that period of destruction there was neither day nor night, neither truth nor untruth, only darkness was in front. That was becoming all-pervasive. That is the night of the universal soul. This is how the meaning of this shrutika should be told and understood.॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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