Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.342.77-78: धनंजय! मैं पहले कभी सत्त्व से च्युत नहीं हुआ। सत्त्व को मुझसे ही उत्पन्न हुआ समझो। मेरा वह प्राचीन सत्त्व इस अवतार में भी विद्यमान है। सत्त्व के कारण ही मैं पापों से मुक्त हूँ और निष्काम कर्मों में रत रहता हूँ। मेरा स्वरूप ईश्वरप्राप्त पुरुषों के सत्त्वज्ञान (पांचरात्र आदि वैष्णवतंत्रों) के माध्यम से जाना जाता है। इन्हीं सब कारणों से लोग मुझे 'सत्त्व' कहते हैं। 77-78। | mahabharat अध्याय 12.342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
धनंजय! मैं पहले कभी सत्त्व से च्युत नहीं हुआ। सत्त्व को मुझसे ही उत्पन्न हुआ समझो। मेरा वह प्राचीन सत्त्व इस अवतार में भी विद्यमान है। सत्त्व के कारण ही मैं पापों से मुक्त हूँ और निष्काम कर्मों में रत रहता हूँ। मेरा स्वरूप ईश्वरप्राप्त पुरुषों के सत्त्वज्ञान (पांचरात्र आदि वैष्णवतंत्रों) के माध्यम से जाना जाता है। इन्हीं सब कारणों से लोग मुझे 'सत्त्व' कहते हैं। 77-78।
Dhananjay! I have never fallen from Sattva before. Consider Sattva to have originated from me. That ancient Sattva of mine exists even in this incarnation. It is because of Sattva that I am free from sins and remain engaged in selfless actions. My nature is known through the Sattva Gyan (Vaishnavtantras like Pancharatra etc.) of the people who have attained God. For all these reasons people call me 'Saattvat'. 77-78.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥