श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  12.342.73 
स्तुत्वा मां शिपिविष्टेति यास्क ऋषिरुदारधी:।
मत्प्रसादादधो नष्टं निरुक्तमभिजग्मिवान्॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
उदारचित्त ऋषि यास्क ने शिपिविष्ठ नाम से मेरी स्तुति करके मेरी कृपा से पाताल में नष्ट हो चुके निरुक्तशास्त्र को पुनः प्राप्त किया था ॥73॥
 
By praising me in the name of Shipivishtha, the generous-conscious sage Yasak had recovered the Nirukta Shastra which had been destroyed in the underworld by my grace. 73॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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