श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  12.342.71 
शिपिविष्टेति चाख्यायां हीनरोमा च यो भवेत्।
तेनाविष्टं तु यत्किंचिच्छिपिविष्टेति च स्मृत:॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
मेरे 'शिपिविष्ट' नाम की व्याख्या इस प्रकार है। रोम रहित प्राणी को 'शिपि' कहते हैं और 'विष्ट' का अर्थ है सर्वव्यापी। मैंने अपने निराकार रूप से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को व्याप्त कर रखा है, इसलिए मुझे 'शिपिविष्ट' कहा जाता है। 71.
 
The explanation of my name 'Shipivisht' is as follows. A hairless creature is called 'Shipi' and 'Visht' means all-pervading. I have pervaded the entire universe in my formless form, hence I am called 'Shipivisht'. 71.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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