श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  12.342.66 
उच्यते—
सूर्याचन्द्रमसौ चक्षु: केशाश्चैवांशव: स्मृता:।
बोधयंस्तापयंश्चैव जगदुत्तिष्ठते पृथक्॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
कहा जाता है कि सूर्य और चंद्रमा (अग्नि और सोम) मेरे नेत्र हैं और उनकी किरणों को केश कहते हैं। सूर्य और चंद्रमा अलग-अलग उदय होते हैं और क्रमशः संसार को ऊष्मा और सुख प्रदान करते हैं। 66.
 
It is said that the Sun and the Moon (Agni and Som) are my eyes and their rays are called hair. The Sun and the Moon rise separately, providing heat and pleasure to the world respectively. 66.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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