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श्लोक 12.342.61  |
| उक्तश्चाप्यपेयो भविष्यस्येतच्च ते तोयं वडवामुखसंज्ञितेन पेपीयमानं मधुरं भविष्यति तदेतदद्यापि वडवामुखसंज्ञितेनानुवर्तिना तोयं समुद्रात् पीयते॥ ६१॥ |
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| अनुवाद |
| उन्होंने उससे यह भी कहा- ‘समुद्र! अब तुम पीने योग्य नहीं रहोगे। तुम्हारा यह जल बड़वमुख द्वारा बार-बार पिए जाने पर मीठा हो जाएगा।’ यह आज भी देखा जाता है। बड़वमुख नामक अग्नि समुद्र का जल पीती है। 61. |
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| Also he said to it- 'Ocean! You will no longer be fit for drinking. This water of yours will become sweet when it is drunk again and again by Badavamukh.' This is seen even today. The fire known as Badavamukh drinks water from the ocean. 61. |
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