श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  12.342.60 
नारायणो लोकहितार्थं वडवामुखो नाम पुरा महर्षिर्बभूव तस्य मेरौ तपस्तप्यत: समुद्र आहूतो नागतस्तेनामर्षितेनात्मगात्रोष्मणा समुद्र: स्तिमितजल:कृत: स्वेदप्रस्यन्दनसदृशश्चास्य लवणभावो जनित:॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
एक बार भगवान नारायण ने लोक कल्याण हेतु बड़वामुख नामक महर्षि का रूप धारण किया। मेरु पर्वत पर तपस्या करते हुए उन्होंने समुद्र का आह्वान किया, किन्तु वह नहीं आया। इससे क्रोधित होकर उन्होंने अपने शरीर की ऊष्मा से समुद्र के जल को अशांत कर दिया और उसे पसीने की धारा के समान खारा बना दिया।
 
Once, Lord Narayana became a Maharishi named Badwamukh for the welfare of the people. While he was performing penance on Mount Meru, he called upon the ocean, but it did not come. Enraged by this, he made the ocean water restless with the heat of his body and made it salty like the flow of sweat. 60.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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