Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.342.59: प्राचीन काल की कथा है, मेरु पर्वत के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थूलशिरा नामक एक महर्षि घोर तपस्या कर रहे थे। जब वे तपस्या कर रहे थे, तब अनेक प्रकार की सुगंधियों से युक्त पवित्र वायु बहने लगी। वह वायु प्रवाहित होकर ऋषि के शरीर को स्पर्श करने लगी। तपस्या से व्यथित शरीर वाले क्षीण ऋषि को उस वायु के वेग से अभिभूत होकर हृदय में महान संतोष का अनुभव हुआ। वायु द्वारा पात्रों के हिलने से संतुष्ट होकर ऋषि के सामने के वृक्षों पर तुरन्त ही पुष्पों की शोभा प्रकट हो गई। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें श्राप दे दिया कि वे सदैव पुष्पों से लदे नहीं रहेंगे। | mahabharat अध्याय 12.342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
प्राचीन काल की कथा है, मेरु पर्वत के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थूलशिरा नामक एक महर्षि घोर तपस्या कर रहे थे। जब वे तपस्या कर रहे थे, तब अनेक प्रकार की सुगंधियों से युक्त पवित्र वायु बहने लगी। वह वायु प्रवाहित होकर ऋषि के शरीर को स्पर्श करने लगी। तपस्या से व्यथित शरीर वाले क्षीण ऋषि को उस वायु के वेग से अभिभूत होकर हृदय में महान संतोष का अनुभव हुआ। वायु द्वारा पात्रों के हिलने से संतुष्ट होकर ऋषि के सामने के वृक्षों पर तुरन्त ही पुष्पों की शोभा प्रकट हो गई। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें श्राप दे दिया कि वे सदैव पुष्पों से लदे नहीं रहेंगे।
It is a story of the past, in the north-eastern part of Mount Meru, a great sage named Sthulashira was performing a very intense penance. While he was performing penance, a holy wind carrying all kinds of fragrances started blowing. That wind flowed and touched the body of the sage. The emaciated sage with a body tormented by penance felt a great satisfaction in his heart after being overcome by that wind. Satisfied by the swaying of the utensils by the wind, the trees in front of the sage immediately showed the beauty of flowers. Angered by this, the sage cursed them that they will not be full of flowers all the time. 59.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥