| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय » श्लोक 53 |
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| | | | श्लोक 12.342.53  | | तत: स देवराड् देवैर्ऋषिभि: स्तूयमानस्त्रिविष्टपस्थो निष्कल्मषो बभूव ह ब्रह्मवध्यां चतुर्षु स्थानेषु वनिताग्निवनस्पतिगोषु व्यभजदेवमिन्द्रो ब्रह्मतेज:प्रभावोपबृंहित: शत्रुवधं कृत्वा स्वं स्थानं प्रापित:॥ ५३॥ | | | | | | अनुवाद | | तत्पश्चात् देवताओं और ऋषियों से अपनी स्तुति सुनकर इन्द्र निष्पाप हो गए और स्वर्ग में रहने लगे। उन्होंने अपनी ब्रह्महत्या को चार स्थानों में विभाजित कर दिया - स्त्री, अग्नि, वृक्ष और गौ। ब्रह्मतेज के प्रभाव से बढ़े हुए इन्द्र ने शत्रुओं का संहार करके पुनः अपना स्थान प्राप्त किया। 53॥ | | | | Thereafter, hearing his praise from the gods and sages, Lord Indra became sinless and started living in heaven. He divided his Brahmahatya into four places – woman, fire, tree and cow. Indra, who grew due to the influence of Brahmatej, regained his position after killing the enemies. 53॥ | | ✨ ai-generated | | |
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