श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.342.51 
अथ मैत्रावरुणि: कुम्भयोनिरगस्त्य ऋषिवरो महर्षीन् धिक‍्‍‍कियमाणांस्तान् नहुषेणापश्यत् पद्भॺां च तेनास्पृश्यत तत: स नहुषमब्रवीदकार्यप्रवृत्त पाप पतस्व महीं सर्पो भव यावद्भूमिर्गिरयश्च तिष्ठेयुस्तावदिति स महर्षिवाक्यसमकालमेव तस्माद् यानादवापतत् ॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
उसी समय मित्रावरुण के पुत्र कुम्भज मुनिवर अगस्त्य ने देखा कि नहुष उन महामुनियों को तीव्र गति से चलने के लिए डाँट-फटकार रहे हैं । उन्होंने अपने दोनों पैरों से अगस्त्य के शरीर को धक्का भी दिया । तब अगस्त्य ने नहुष से कहा - 'पापी नहुष, तूने ऐसा नीच कर्म किया है जो नहीं करना चाहिए ! तू अभी पृथ्वी पर गिर और जब तक पृथ्वी और पर्वत स्थिर रहें, तब तक सर्प बन जा ।' महर्षि के ऐसा कहते ही नहुष उस वाहन से नीचे गिर पड़े ॥51॥
 
At the same time, Kumbhja Munivar Agastya, son of Mitravaruna, saw that Nahusha was scolding and scolding the great sages for walking at a fast pace. He also pushed Agastya's body with both his feet. Then Agastya said to Nahusha - 'Sinful Nahusha, you have indulged in vile deeds which should not be done! You fall on the earth now and become a snake as long as the earth and mountains remain stable.' As soon as Maharishi said this, Nahusha fell down from that vehicle. 51॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd