| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय » श्लोक 47 |
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| | | | श्लोक 12.342.47  | | तामथोवाच नहुष ऐन्द्रं पदमध्यास्यते मयाऽहमिन्द्रस्य राज्यरत्नहरो नात्राधर्म: कश्चित् त्वमिन्द्रोप-भुक्तेति सा तमुवाचास्ति मम किंचिद् व्रतमपर्यवसितं तस्यावभृथे त्वामुपगमिष्यामि कैश्चिदेवाहोभिरिति स शच्येवमभिहितो जगाम॥ ४७॥ | | | | | | अनुवाद | | तब नहुष ने शची से कहा, 'देवी! इस समय मैं इन्द्र के सिंहासन पर आसीन हूँ। मैं इन्द्र के राज्य और रत्नों का स्वामी हो गया हूँ; अतः आपके साथ समागम करने में कोई पाप नहीं है; क्योंकि आप इन्द्र के भोग की वस्तु हैं।' यह सुनकर शची बोली, 'महाराज! मैंने एक व्रत लिया है। वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। उसके पूर्ण होने पर मैं कुछ ही दिनों में आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगी।' शची के ऐसा कहने पर नहुष वहाँ से चले गए। 47. | | | | Then Nahush said to Shachi, 'Goddess! At this time I am established on the throne of Indra. I have become the owner of both Indra's kingdom and gems; hence there is no sin in having intercourse with you; because you are the object for Indra's enjoyment.' On hearing this Shachi said, 'Maharaj! I have taken a vow. It has not ended yet. After its completion, I will present myself in your service in a few days.' On Shachi saying this, Nahush left. 47. | | ✨ ai-generated | | |
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