| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय » श्लोक 46 |
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| | | | श्लोक 12.342.46  | | अथोवाच नहुष: सर्वं मां शक्रोपभुक्तमुपस्थितमृते शचीमिति स एवमुक्त्वा शचीसमीपमगमदुवाचैनां सुभगेऽहमिन्द्रो देवानां भजस्व मामिति तं शची प्रत्युवाच प्रकृत्या त्वं धर्मवत्सल: सोमवंशोद्भवश्च नार्हसि परपत्नीधर्षणं कर्तुमिति॥ ४६॥ | | | | | | अनुवाद | | कुछ समय पश्चात् नहुष ने देवताओं से कहा, ‘इन्द्र के उपयोग की अन्य सभी वस्तुएँ मुझे उपलब्ध हैं। केवल शची ही मुझे नहीं दी गई है।’ यह कहकर वे शची के पास गए और उससे बोले, ‘हे सौभाग्यवती! मैं देवताओं का राजा इन्द्र हूँ। कृपया मेरी सेवा स्वीकार करें।’ शची ने उत्तर दिया, ‘महाराज! आप स्वभाव से ही धर्मप्रेमी और चन्द्रवंश के रत्न हैं। आपको परस्त्री के साथ बलात्कार नहीं करना चाहिए।’ | | | | After some time Nahusha said to the gods, 'All the other things which are used by Indra are available to me. Only Shachi has not been given to me.' Saying this, he went to Shachi and said to her, 'Fortunate one! I am Indra, the king of the gods. Please accept my service.' Shachi replied, 'Maharaj! You are by nature a lover of Dharma and a jewel of the Chandravansh. You should not rape another's woman.' | | ✨ ai-generated | | |
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