श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.342.40 
अथ दधीचस्तथैवाविमना: सुखदु:खसमो महायोगी आत्मानं समाधाय शरीरपरित्यागं चकार॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर दधीचि का उत्साह पहले जैसा ही रहा, उन्हें तनिक भी दुःख नहीं हुआ । वे सुख-दुःख में समान भाव रखने वाले महान योगी थे । उन्होंने अपनी आत्मा को परमात्मा में लीन करके शरीर त्याग दिया ॥40॥
 
On hearing this, Dadhichi's enthusiasm remained the same as before, he did not feel sad at all. He was a great Yogi who had the same feelings in happiness and sorrow. He left his body by immersing his soul in the Supreme Soul. ॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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