श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.342.36 
तान् ब्रह्मोवाच ऋषिर्भार्गवस्तपस्तप्यते दधीच: स याच्यतां वरं स यथा कलेवरं जह्यात् तथा विधीयतां तस्यास्थिभिर्वज्रं क्रियतामिति॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
तब ब्रह्माजी ने उन देवताओं से कहा- 'भृगुवंशी दधीचि ऋषि तपस्या कर रहे हैं। उनके पास जाओ और ऐसा वर मांगो कि वे अपना शरीर त्याग दें। फिर उनकी हड्डियों से वज्र नामक अस्त्र बनाओ।'
 
Then Brahmaji said to those gods- 'Bhriguvanshi Dadhichi Rishi is doing penance. Go to him and ask for such a boon that he gives up his body. Then make a weapon called Vajra from his bones.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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