श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.342.33 
तास्त्वाष्ट्र उवाच क्व गमिष्यथास्यतां तावन्मया सह श्रेयो भविष्यन्तीति तास्तमब्रुवन् वयं देवस्त्रियोऽप्सरस इन्द्रं देवं वरदं पुरा प्रभविष्णुं वृणीमह इति॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
तब त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ने उनसे कहा, 'तुम कहाँ जाओगी? अभी मेरे पास यहीं रहो। यही तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा।' यह सुनकर अप्सराएँ बोलीं, 'हम सभी दिव्य अप्सराएँ हैं। हमने पहले ही प्रभावशाली, वरदान देने वाले देवता इंद्र को चुन लिया है।'
 
Then Vishwaroop, son of Tvashta, said to her, 'Where will you go? Stay here with me for now. This will be good for you.' Hearing this, the Apsaras said, 'We are all celestial nymphs. We have already chosen the influential Indra, the boon-giving god.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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