श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.342.31 
हैरण्यगर्भाच्च वसिष्ठाद्धिरण्यकशिपु: शापं प्राप्तवान् यस्मात् त्वयान्यो वृतो होता तस्मादसमाप्त-यज्ञस्त्वमपूर्वात् सत्त्वजाताद् वधं प्राप्स्यसीति तच्छापदानाद्धिरण्यकशिपु: प्राप्तवान् वधम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
(हिरण्यकशिपु ने उसे अपना बना लिया) इधर हिरण्यकशिपु को ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठ से शाप मिला- 'तूने मेरी आज्ञा न मानकर दूसरे का वरण किया है; अतः इस यज्ञ के पूर्ण होने से पूर्व ही किसी अभूतपूर्व प्राणी द्वारा तेरा वध हो जाएगा।' वशिष्ठजी द्वारा दिए गए शाप के कारण हिरण्यकशिपु मारा गया॥31॥
 
(Hiranyakshipu made him his own being) Here, Hiranyakshipu received a curse from Brahmaji's son Vashishtha - 'You have disobeyed me and chosen another being; Therefore, even before the completion of this Yagya, you will be killed by some unprecedented creature. Due to the curse given by Vashishtha, Hiranyakashipu was killed. 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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