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mahabharat 12.342.30: फिर एक दिन माँ ने नंदनवन में विश्र्वारूप से कहा, "पुत्र, तुम अपने मामा के पक्ष को नष्ट करके दूसरे पक्ष को क्यों बढ़ा रहे हो? तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।" विश्र्वारूप ने अपनी माँ की आज्ञा का सम्मान किया और उन्हें विदा करके स्वयं हिरण्यकशिपु के पास गए।   |   mahabharat अध्याय 12.342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.342.30 
अथ विश्वरूपं नन्दनवनमुपगतं मातोवाच पुत्र किं परपक्षवर्धनस्त्वं मातुलपक्षं नाशयसि नार्हस्येवं कर्तुमिति स विश्वरूपो मातुर्वाक्यमनतिक्रमणीयमिति मत्वा सम्पूज्य हिरण्यकशिपुमगात्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
फिर एक दिन माँ ने नंदनवन में विश्र्वारूप से कहा, "पुत्र, तुम अपने मामा के पक्ष को नष्ट करके दूसरे पक्ष को क्यों बढ़ा रहे हो? तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।" विश्र्वारूप ने अपनी माँ की आज्ञा का सम्मान किया और उन्हें विदा करके स्वयं हिरण्यकशिपु के पास गए।
 
Then one day the mother said to Viśvarūpa, who was in the Nandanvana forest, "Son, why are you destroying your maternal uncle's side while increasing the other side? You should not do this." Viśvarūpa respected his mother's command and sent her off and went to Hiranyākaśipu himself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)