श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.342.28 
विश्वरूपो हि वै त्वाष्ट्र: पुरोहितो देवानामासीत् , स्वस्रीयोऽसुराणां स प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमदात् परोक्षमसुरेभ्य:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप देवताओं के पुरोहित थे। वे दैत्यों के भांजे लगते थे; अतः वे यज्ञों का भाग प्रत्यक्ष रूप से देवताओं को और अप्रत्यक्ष रूप से दैत्यों को देते थे ॥28॥
 
Tvashta's son Vishvarupa was the priest of the gods. They looked like nephews of demons; Therefore, they used to give a share of the yagyas directly to the gods and indirectly to the demons. 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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