श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.342.27 
अमृतोत्पादने पुरश्चरणतामुपगतस्याङ्गिरसो बृहस्पतेरुपस्पृशतो न प्रसादं गतवत्य: किलाप:, अथ बृहस्पतिरपां चुक्रोध यस्मान्ममोपस्पृशत: कलुषीभूता न च प्रसादमुपगतास्तस्मादद्यप्रभृति झषमकरकच्छपजन्तुभि:कलुषीभवतेति, तदा प्रभृत्यापो यादोभि: संकीर्णा: सम्प्रवृत्ता:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
अंगिरा के पुत्र बृहस्पति ने अमृत निर्माण के समय पुरश्चरण आरम्भ किया। उस समय जब उन्होंने जल पीना आरम्भ किया, तो जल स्वच्छ नहीं हुआ। इससे बृहस्पति जल पर क्रोधित हो गए और बोले - 'मेरे जल पीने पर भी तू स्वच्छ नहीं हुआ, गंदा ही रहा; इसलिए आज से तू मछली, मगरमच्छ और कछुए आदि जन्तुओं से प्रदूषित होता रहेगा।' उसी समय से समस्त जलाशय जलचरों से भरने लगे॥ 27॥
 
Angira's son Brihaspati started Purashcharana at the time of producing Amrit. At that time when he started sipping water, the water did not become clean. This made Brihaspati angry with the water and he said - 'Even when I sipped water, you did not become clean, you remained dirty; therefore from today onwards you keep getting polluted by animals like fish, crocodile and tortoise.' From that time onwards all the water bodies started getting filled with aquatic animals.॥ 27॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd