| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय » श्लोक 26 |
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| | | | श्लोक 12.342.26  | | त्रिपुरवधार्थं दीक्षामुपगतस्य रुद्रस्य उशनसा जटा: शिरस उत्कृत्य प्रयुक्तास्तत: प्रादुर्भूता भुजगास्तैरस्य भुजगै: पीडॺमान: कण्ठो नीलतामुपगत: पूर्वे च मन्वन्तरे स्वायम्भुवे नारायणहस्तग्रहणान्नीलकण्ठत्वमेव च॥ २६॥ | | | | | | अनुवाद | | जब रुद्र ने त्रिपुर में निवास करने वाले दैत्यों का संहार करने के लिए दीक्षा ली, तब शुक्राचार्य ने उनके सिर से जटाएँ उखाड़कर महादेवजी पर चला दीं। तब उन जटाओं से बहुत से सर्प उत्पन्न हुए, जो रुद्रदेव के कंठ पर डसने लगे। इससे उनका कंठ नीला पड़ गया और प्रथम स्वायम्भुव मन्वन्तर में नारायण ने अपने हाथ से उनका कंठ पकड़ लिया था, अतः कंठ का रंग नीला हो जाने के कारण रुद्रदेव नीलकंठ हो गए॥26॥ | | | | When Rudra took initiation to kill the demons residing in Tripura, Shukracharya pulled out the matted locks from his head and used them on Mahadevji. Then many snakes were born from those matted locks, which started biting Rudradev on his throat. Due to this his throat became blue and in the first Swayambhuva Manvantar Narayan had held his throat with his hand, hence Rudradev became Neelkanth due to the color of his throat becoming blue.॥26॥ | | ✨ ai-generated | | |
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