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श्लोक 12.342.2  |
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते वर्तयिष्यामि पुराणं पाण्डुनन्दन।
आत्मतेजोद्भवं पार्थ शृणुष्वैकमना मम॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| श्री भगवान बोले - पाण्डुनन्दन! कुन्तीकुमार! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें अपनी महिमा की उत्पत्ति की प्राचीन कथा सुनाता हूँ। तुम एकचित्त होकर मेरी बात सुनो॥2॥ |
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| Shri Bhagwan said – Pandunandan! Kuntikumar! I will gladly tell you the ancient story of the origin of my glory. You listen to me with one mind. 2॥ |
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