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mahabharat 12.342.14: जो विद्वान ब्राह्मण मुखरूपी अग्नि में अन्न अर्पित करता है, वह मानो जलती हुई अग्नि में आहुति दे रहा है ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.342.14 
अग्नौ समिद्धे स जुहोति यो विद्वान् ब्राह्मणमुखेनाहुतिं जुहोति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जो विद्वान ब्राह्मण मुखरूपी अग्नि में अन्न अर्पित करता है, वह मानो जलती हुई अग्नि में आहुति दे रहा है ॥14॥
 
The scholar who offers food to the fire in the form of a Brahmin's face is as if he is performing oblations in the burning fire. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)