श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  12.342.138 
एवं बहुविधै रूपैश्चरामीह वसुन्धराम्।
ब्रह्मलोकं च कौन्तेय गोलोकं च सनातनम्॥ १३८॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! इस प्रकार मैं नाना प्रकार के रूप धारण करके इस पृथ्वी पर विचरण करता हूँ, ब्रह्मलोक में निवास करता हूँ और सनातन गोलोक में विचरण करता हूँ॥ 138॥
 
O son of Kunti! Thus, assuming various forms, I roam about on this earth, reside in Brahmaloka and wander about in the eternal Goloka.॥ 138॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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