श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 135-136
 
 
श्लोक  12.342.135-136 
श्रीभगवानुवाच
एवं लक्षणमुत्पाद्य परस्परकृतं तदा।
सख्यं चैवातुलं कृत्वा रुद्रेण सहितावृषी॥ १३५॥
तपस्तेपतुरव्यग्रौ विसृज्य त्रिदिवौकस:।
एष ते कथित: पार्थ नारायणजयो मृधे॥ १३६॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - 'पार्थ! इस प्रकार अपने-अपने शरीर में एक-दूसरे के द्वारा किये हुए चिह्न (चिन्ह) उत्पन्न करके उन दोनों ने रुद्रदेव ऋषि के साथ अनन्य मैत्री स्थापित की और देवताओं को विदा करके वे शान्त हो गए तथा पूर्ववत् तप करने लगे। इस प्रकार मैंने युद्ध में नारायण की विजय की कथा तुमसे कही है। 135-136॥
 
Lord Shri Krishna says – 'Partha! In this way, by creating in their respective bodies such signs (marks) as had been done by each other, both of them established a unique friendship with sage Rudradev and after bidding farewell to the gods, they became calm and started performing penance as before. In this way I have told you the story of Narayan's victory in the war. 135-136॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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