श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  12.342.134 
अद्यप्रभृति श्रीवत्स: शूलाङ्को मे भवत्वयम्।
मम पाण्यङ्कितश्चापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि॥ १३४॥
 
 
अनुवाद
आज से मेरी छाती पर तुम्हारे भाले का यह चिह्न ‘श्रीवत्स’ नाम से प्रसिद्ध होगा और तुम्हारे कंठ पर मेरे हाथ का चिह्न होने के कारण तुम भी ‘श्रीकंठ’ नाम से प्रसिद्ध होगे॥134॥
 
‘From today onwards this mark of your spear on my chest will be known as ‘Shrivatsa’ and because of the mark of my hand on your throat, you too will be known as ‘Srikanth’.॥ 134॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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