श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  12.342.130 
ब्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्र: क्रोधाग्निमुत्सृजन्।
प्रसादयामास ततो देवं नारायणं प्रभुम्।
शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम्॥ १३०॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर रुद्रदेव ने क्रोधाग्नि त्याग दी और फिर आदिदेव, वरेण्य, वरदाता, सर्वशक्तिमान भगवान नारायण को प्रसन्न करके उनकी शरण ली ॥130॥
 
On Brahmaji saying this, Rudradev gave up his fire of anger. Then he pleased Adidev, Varenya, the giver of blessings, the all-powerful Lord Narayana and took refuge in him. 130॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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