| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय » श्लोक 13 |
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| | | | श्लोक 12.342.13  | | न ह्यृते मन्त्राणां हवनमस्ति न विना पुरुषं तप: सम्भवति। हविर्मन्त्राणां सम्पूजा विद्यते देवमानुष-ऋषीणामनेन त्वं होतेति नियुक्त:। ये च मानुषहोत्राधिकारास्ते च ब्राह्मणस्य हि याजनं विधीयते न क्षत्रवैश्ययोर्द्विजात्योस्तस्माद् ब्राह्मणा ह्यग्निभूता यज्ञानुद्वहन्ति। यज्ञास्ते देवांस्तर्पयन्ति देवा: पृथिवीं भावयन्ति शतपथेऽपि हि ब्राह्मणमुखे भवति॥ १३॥ | | | | | | अनुवाद | | क्योंकि मन्त्रों के बिना हवन संभव नहीं है और मनुष्य के बिना तप संभव नहीं है। हविष्य मन्त्रों के द्वारा देवता, मनुष्य और ऋषिगण पूजित होते हैं; इसलिए हे अग्निदेव! आपको होता नियुक्त किया गया है। मनुष्यों में जो भी अधिकार हैं, वे ब्राह्मणों के ही हैं; क्योंकि उसके लिए यज्ञ करने का विधान है। क्षत्रिय और वैश्य, इन दो वर्णों में से किसी को यज्ञ करने का अधिकार नहीं है; इसीलिए अग्निरूपी ब्राह्मण ही यज्ञों का भार वहन करते हैं। वे यज्ञ देवताओं को तृप्त करते हैं और देवता पृथ्वी को धन-धान्य से युक्त करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में भी ब्राह्मण के मुख में आहुति देने की बात कही गई है॥13॥ | | | | Because without mantras, Havan is not possible and without a man, penance is not possible. Gods, humans and sages are worshiped with the help of havishya mantras; That's why O Agnidev! You have been appointed Hota. Whatever rights are there among humans, they belong to Brahmins only; Because there is a provision to perform Yagya for him. The Kshatriyas and Vaishyas among the two castes do not have the right to perform Yagya; That is why only Brahmins in the form of fire bear the burden of yagyas. Those yagyas satisfy the gods and the gods make the earth rich with wealth and grains. Even in Shatapatha Brahmana, it has been said about offering sacrifice in the mouth of a Brahmin. 13॥ | | ✨ ai-generated | | |
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